कार्यप्रणाली को लेकर उठाए गए सवाल मगर कार्रवाई शून्य ?


सुनहरा संसार


  मध्यप्रदेश परिवहन विभाग में संयुक्त परिवहन आयुक्त (वित्त) द्वारा कार्यादेश को दूसरी शाखाओं पर टालने से खिन्न होकर तत्कालीन परिवहन आयुक्त द्वारा संयुक्त परिवहन आयुक्त को गैरजिम्मेदार मानते हुए बाकायदा नोटिस जारी कर उनकी सेवाएं मूल विभाग को वापिस करने के लिए लिखा और मामला ठंडे बस्ते में चला गया। अहम सवाल यह है कि जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारी के प्रति बरिष्ठ अधिकारी को इतने कड़े रुख की जरूरत क्यों पड़ी और पड़ी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?


 


प्राप्त जानकारी के अनुसार वित्त मंत्रालय द्वारा परिवहन विभाग से वर्ष 2019 में जीएसटी निर्धारण के लिए नीलामी में आवंटित किए गए वाहनों के पंजियन नंबरों के बारे में समयावधि के साथ जानकारी चाही गई थी और समय पर जानकारी न देने पर अर्थदण्ड का उल्लेख भी किया गया था।


ज्ञात हो कि विभागों में वित्तीय लेखा-जोखा और कार्य व्यवस्था के लिए प्रतिनियुक्ति पर वित्त विभाग के अधिकारियों को पदस्थ किया जाता है। लेकिन मध्यप्रदेश परिवहन विभाग में पदस्थ सयुंक्त परिवहन आयुक्त (वित्त) द्वारा गंभीरता से निज दायित्वों का निर्वहन करने के बजाय चाही गई जानकारी से संबंधित फाइल को इधर से उधर कभी तकनीकी शाखा तो कभी कर (टेक्स) शाखा में घुमाया गया या यूं कहें कि लंबे समय तक अॉफिस-अॉफिस खेला गया। जबकि वित्त विभाग द्वारा चाही गई जानकारी में स्पष्ट था कि परिवहन विभाग द्वारा नीलामी में आवंटित किए गए नंबरों पर जीएसटी निर्धारण करने के लिए दस्तावेज सहित जानकारी, जो पूरी तरह से परिवहन विभाग की वित्तीय शाखा से संबंधित थी। 


इस मामले में अहम बात यह थी कि वरिष्ठ कार्यालय द्वारा चाही गई जानकारी समयावधि में उपलब्ध न कराने पर परिवहन विभाग से जुर्माना भी वसूल किये जाने का स्पष्ट उल्लेख था इसके बावजूद भी न तो संयुक्त परिवहन आयुक्त (वित्त) ने और न ही वित्तीय शाखा के अन्य कर्मचारियों ने इसे गंभीरता से लिया ।


प्रकरण की गंभीरता को समझते हुए तत्कालीन परिवहन आयुक्त शैलेन्द्र श्रीवास्तव ने इस लापरवाही पर अत्यंत नाराजगी जाहिर की और संयुक्त परिवहन आयुक्त (वित्त) एल. एन. सुमन को कारण बताओ नोटिस जारी किया, जिसमें यह स्पष्ट उल्लेख किया गया था कि क्यों न इस लापरवाही के कारण उनकी सेवाएं उनके मूल विभाग को वापस कर दी जायें ।इस संबंध में परिवहन मंत्री का पक्ष जानने के लिए फोन पर संपर्क किया गया मगर मीटिंग में होने के कारण बात नहीं हुई।


 


* सवाल उठना लाजिमी है कि विभाग में वित्तीय व्यवस्था के लिए सुनिश्चित जिम्मेदार अधिकारी द्वारा विषय की गंभीरता को जानते हुए जानकारी उपलब्ध कराने के बजाय मामले को इधर-उधर उलझा कर क्यों लंबित किया गया ?


* वहीं संबंधित अधिकारी की कार्यकुशलता पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए तत्कालीन परिवहन आयुक्त ने उनकी सेवाएं मूल विभाग को सौपने तक की ताकीद कर दी मगर क्या कारण रहे कि आगे कोई कार्रवाई नहीं की गई। 


इनका कहना 


जो आप बता रहे हैं उसे एक साल हो गया तत्कालीन परिवहन आयुक्त हमारे सीनियर हैं उन्होंने क्यों लिखा क्या कार्रवाई हुई वही बता सकते हैं। 


व्ही मधु कुमार 


परिवहन आयुक्त 


      मप्र 


 


 


 


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