सिंधिया का खास बनकर पहचान बनाई, त्याग की बारी आई तो कांग्रेस मे माँ नजर आई


सुनहरा संसार 


क्या ऐसे लोग कांग्रेस पार्टी के लिए बाकई बफादार हैं, बेस


मप्र। पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने लगातार हो रही उपेक्षा से दुखी हो कर 18 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी से नाता तोड़ कर भाजपा का दामन थामा तो प्रदेश की राजनीति में भूचाल आ गया। इसे देखते हुए सिंधिया को नेता मानने वालों में इस्तीफे की होड़ सी लग गई। मगर अब कुछ लोग इस्तीफा वापस लेकर कांग्रेसी होने का दंभ भर रहे हैं, तो कांग्रेस के वागी नेता उनकी निष्ठा पर सवाल उठा रहे हैं । 

दरअसल सिंधिया के कांग्रेस में रहते ग्वालियर चंबल संभाग में संगठनात्मक व्यवस्था में ज्यादातर निर्णय और नियुक्तियां उन्ही के आधार पर की जाती रही है। यही वजह थी कि अब से पहले तक अंचल का हरेक छोटा - बड़ा नेता अपने आप को सिंधिया के करीब होने पर गर्व महसूस करता था लेकिन जैसे ही सिंधिया का भोपाल में भाजपा द्वारा जोरदार स्वागत दिखा तो ऐसे लोगों को अपना राजनीतिक भविष्य खतरे में लगने लगा ।

सबसे बड़ी बात यह है कि कांग्रेस में सिंधिया के बगावती तेवरों के दौरान उनके तथाकथित खासमखासों ने अपने आप को महाराज का हितेशी दिखाने के लिए सोशल मीडिया पर मुहिम तक छेड़ दी। उन्हे अलग पार्टी खड़ी करने के लिए कहा गया, ट्रेंड चलाया गया , कांग्रेस प्रमुख के यहां पत्राचार किए गए। वास्तव में देखा जाए तो ऐसे ही कार्यकर्ताओं की वजह से कमलनाथ और सिंधिया के संबंधों में खाई पेदा हुई, क्योंकि सिंधिया ने अपने आप से ज्यादा कार्यकर्ताओं के काम को अहमियत दी है । ये बात कांग्रेसियों के बयानों से स्पष्ट होती है कि सिंधिया खुद को नहीं अपने फलां नेता को अध्यक्ष बनाना चाहते थे, वहीं उनके कार्यकर्ताओं की शिकायत थी कि उनकी सुनवाई नहीं होती। यकीनन सिंधिया द्वारा इस तरह के उठाए गए कदम के लिए बहुत हद तक ऐसे लोग ही जिम्मेदार हैं। अब जब वास्तविक रूप से साथ चलने की बारी आई तो सबसे पहले ऐसे ही हितेशियों ने डूबते जहाज की तरह महाराज से किनारा कर लिया। उदाहरण के तौर पर प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रामनिवास रावत, जिनकी पहचान कांग्रेसी से कहीं ज्यादा सिंधिया के सिपाही के तौर पर मानी जाती है और सिंधिया के कहने पर ही उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था लेकिन अब उन्होंने सिंधिया का साथ छोड़ दिया। वहीं ग्वालियर की कांग्रेस नेत्री रुचि ठाकुर ने सिंधिया को अलग पार्टी बनाने की पोस्ट डालकर खूब सुर्खियां बटोरी और इस्तीफा भी दिया लेकिन कांग्रेस कार्यालय में मीटिंग हुई तो उन्होंने इस्तीफे को भूल बताया और कांग्रेस को अपनी मां करार दिया।

अब सिंधिया को अपना नेता मानकर वागी कांग्रेसियों ने ऐसे लोगों की निष्ठा पर प्रश्नचिन्ह लगाना शुरू कर दिए। उनका कहना है कि जिन लोगों का कोई अस्तित्व नहीं था, उन्होंने सिंधिया से जुड़कर नाम, पद, प्रतिष्ठा सब कुछ पाया, क्या वे लोग तब कांग्रेसी नहीं थे। तब ऐसे लोग सिंधिया के अलावा किसी अन्य नेता के यहां क्यों नहीं जाते थे, क्यों अपने आपको कांग्रेस का सिपाही कहने के बजाय सिंधिया का सिपाही कहने में गर्व महसूस करते थे और उन्हें अपना राजनेतिक भगवान मानते थे और अब वही लोग श्री सिंधिया द्वारा दी गई पहचान को भुलाकर कांग्रेस को अपनी मां बता रहे हैं क्या ऐसे लोग वाकई कांग्रेस के लिए वफादार साबित होंगे जो अपने नेता के नहीं हुए.? 

 ऐसी ही पीड़ा व्यक्त करते हुए सिंधिया के पक्ष में कांग्रेस से वागी हुए राम अवतार सिंह बेस (पूर्व लोकसभा महासचिव युवक कांग्रेस) ने कहा कि जो साथी वर्तमान स्थिति में स्वयं को कांग्रेस के सच्चे सिपाई,कांग्रेस के सपूत,कांग्रेस के निष्ठावान,अंतिम सांस तक जिएंगे कांग्रेस के लिए इस तरह के स्लोगन के साथ दहाड़ मार रहे हैं। 

वही लोग कुछ दिन पहले सिंधिया जी के साथ विकास कांग्रेस में जाने को आतुर थे और तब लिख रहे थे कि जिनके इरादे बुलंद होते हैं वह किसी पद के मोहताज नही होते,मेरा नेता मेरा स्वाभिमान,श्रीमंत में आस्था बाकी नही किसी से वास्ता, क्या तब इन लोगो के लिए कांग्रेस पार्टी माँ नही थी। 

उन्होंने ऐसे लोगों की निष्ठा पर प्रहार करते हुए कहा कि सच्च तो यह हैं कि ऐसे लोगो की बजह से ही कांग्रेस पार्टी दुर्दसा के दौर से गुजर रही हैं, वास्तव में ऐसे लोग केवल स्वार्थ सिद्धि तक ही साथ होते हैं जिनकी न तो पार्टी में आस्था होती है और न ही व्यक्ति में । 

 

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